Thursday, September 13, 2012

जनलोकपाल, चुनाव, अन्ना ओर भारत भ्रष्टाचार के खिलाफ़!

पिछले लगभग एक वर्ष से ना सिर्फ़ देश ब्लकि आंदोलन, सूत्रधार, मीडिया ओर अन्ना ऐसे स्थिति मे पहुँच गये है, जहाँ उनसे जनलोकपाल के बारे मे पूछना गर्व का न होकर एक झुनझूलाहट का विषय बन गया है! हम गर्व की स्थिति से झुनझूलाहट की ओर विवाद की स्थिति मे क्यों है, क्यों नही हम उतने ही स्पष्ट ओर गोर्वन्तित है जितना हम पिछले वर्ष के एप्रिल माह मे थे! सबसे ज़्यादा विचारशील विषय है की इन सब विवादो मे जनलोकपाल कहाँ है? क्या अब हम जनलोकपाल छोड़कर हर विषय मे अपनी राय रखते हैं ओर जनलोकपाल को हमने चुनावी भट्टी मे झोंक दिया है अपने समय तक पकने के लिए?

वास्तीविक्ता मे ये सब सिर्फ़ या तो सिरफिरे लोगो का चिंतन विषय है या आंदोलन से जुड़े लोगो का! ये मेरा अनुमान इस आधार पर है की मेरे कार्यालय मे जहाँ 500 से 600 लोग काम करते हैं वहाँ केवल 4-6 लोग ही आंदोलन का समर्थन करते है तथा होने वाले घटनाक्रम से हताश या खुश होते हैं! ये वास्तीविक्ता उतनी ही तर्कसंगत है जितनी की किसी विषय पर poll कराने की, या फिर जो लोग यह मानते है की आंदोलन की शक्ति युवा व शिक्षित युवा पीढ़ी है! मेरे कार्यालय मे ओसत आयु 32 वर्ष व ओसत वेतन 30000 हज़ार है!

मे आपसे अपने कुछ विश्लेषण बाँटना चाहूँगा, अहसमति के आपके मौलिक अधिकार के सम्मान के साथ, बिना इस बात को नज़रअंदाज किये - यहाँ ज्ञान मत बाँटो की हम सभी ज्ञानि हैं!

जनआंदोलन : सत्य, सत्य होता है चाहे उसे 1 व्यक्ति बोले या 1 करोड़! संगठित ओर ध्येयवादि कम लोगो का समूह ज़्यादा कारगर व असरदायी होता है वनस्पीतन लाखो की भीड़ के!  जब हर व्यक्ति अपने को आंदोलन का हिस्सा मानकर अपने ज्ञान का भार दूसरे के ज्ञान से ज़्यादा पाता है तो हर कोई आंदोलन को अपनी  की ओर ले जाना चाहता है! जिस आंदोलन के 2010 के रचीयता बेमानी हो जाए व उसका चेहरा भी आंदोलन की दिशा जानने के लिए वोटो के लिए आश्रित हो जाए ऐसे आंदोलन की दिशा व ध्येय की आयु कितनी होगी चिंतन का विषय है! ये भी चिंतन का विषय है की जन भवाना कितने कितने समय के बाद जाननी होगी!  एक काल्पनिक स्थिति को मानते हुए ये पाया जाए की अब जन समर्थन आंदोलन के साथ नही है तो क्या आंदोलन वापिस ले लेना चाहिए!

आत्म तुषटिकरण :  जब से आंदोलन का संचालन श्री दिग्विजय सिंह व हमारी गेर उत्तरदायी मीडिया के पास गया, आंदोलन बचाव व दोषभाव का प्रयाय बन गया! श्री सिंह के उकसाने पर हमारे तीन सपूत आमरण अनशन पर बैठ गये ओर फिर जो हुआ हम सब उसके साक्षी हैं BEA के धमकीपूर्रन रविये पर भी हम मंच से माफी माँगते नज़र आए! मीडिया ने या फिर श्री दिग्विजय जैसे हर संस्थान के तुके बेतुके हर  सवाल का उत्तर देने को लालायित नज़र आए! मेरा मानना ये है की उन्होने जनलोकपाल को छोड़कर हर वो सवाल किए जो की उन्हे राज्नेतिक व्यवस्था से करने चाहिए थे! जनलोकपाल का ये आंदोलन था ओर एक मजबूत स्थिति मे थे जहाँ ना तो श्री दिग्विजय को ना ही मीडिया को कुछ पूछना था, वो जिस इरादे से जुड़े थे उसे पूरा करे के वो दरकिन्नार हो गये! ज़रा बेतुके प्रशनो पर नज़र डालिए ओर जो उत्तर उन्हे मिले उस से क्या आंदोलन मजबूत हुआ!

क) चरित्र व निजी जीवन पर आधारित सवाल!
ख) मंच सज्जा पर क्या हो या ना हो उस पर भी बवाल
ग)  मंच पर कौन बैठे ओर कौन उठे, उस पर भी संदेह
घ) भीड़ नही है, भीड़ कहाँ गयी
ङ) फ्ला फ्ला पार्टी के बारे मे आपकी राय
च) आप चुनाव क्यो नही लड़ते

ये बात स्पष्ट थी की सिर्फ़ अन्ना के अकेले ही अनशन बैठने पर हम गंतव्य तक पहुँच सकते थे, तो कैसे ये व्यापक अनशन व व्यापक जन समर्थन का आश्रित हो गया ओर जनलोकपाल से भटकर चुनाव व विश्व भर के सुधारो की ओर निकल गया!

चुनाव : एक आदर्श व कार्यवाहक दिशा, ये उतना ही प्रभावशाली है जितना की काल्पनिक! अगर हम इस स्थिति मे पहुँच जाते है जहाँ आज ना तो 110 वर्ष पूरानी कांग्रेस है, तो शायद जनलोकपाल मिल जाए!  हालाँकि आज स्थिति साफ़ नही है की आंदोलन चुनाव की राह पर जाएगा या संघर्ष की! मेरे आकलन से संघर्ष की दिशा प्रभावी व तेज है! कई कारण है इस आकलन के जैसे की आप नेतिक आधार पर एक लक्ष्य को लेकर सफल होने के अधिक संभावन्ना छेत्र मे है!