Monday, January 6, 2014
Tuesday, December 31, 2013
पानी ओर राजनीति - चुनावी पार्टीयो व मीडिया की
क्या बचकाना पन है मीडिया ओर राजनीति का 700 लीटर पानी के लिये तिकडम ओर हाथापाई ओर सब तरह के हथकंडे
दिल्ली के साथ लगे गुड़गाँव के मेरे कार्यालय मे केवल एक तल (floor) की पानी शुध करने की मशीन (water purifier) 700 लीटर पानी एक दिन मे नाली मे उपयोग मे ना जाने लायक़ (waste) पानी को बहा देती है ओर यहाँ दिल्ली मे कोई मुख्यमंत्री बन जाता है - विडंबना !
दिल्ली के मुख्यमंत्री अनुसार निशुल्क पानी की व्यवस्था केवल मीटर लगे घरो को मिलेगी, अनुमान अनुसार इस सुविधा का लाभ दिल्ली की केवल 20% आम जनता को मिल पायेगा, बाकी कुछ ओर समय प्रतीक्षा करें! विभिन्न स्रोतो अनुसार पिछली मुख्यमंत्री भी यही सुविधा इन्ही आम जनता को लगभग 90% दे रही थी, आंकडो मे कहें तो पिछली सरकार लगभग 1500 करोड़ की राहत देती थी नयी सरकार ने उसमे 150 करोड़ बड़ा कर 1650 करोड़ कर दिया है!
यहाँ नीचे मुख्यमंत्री साहब के फसेबूक प्रष्ट का अपडेट है - इसमे छीपी राजनीति आप समझ सकते हैं!

We have fulfilled our first promise. From 1st January, all Delhi homes will get 20 Kiloliter of free water. To promote water conservation, it has been decided that families whose water consumption is more than the stipulated limit, will have to pay for the entire usage. || हमने अपना पहला वादा पूरा किया. 1 जनवरी से दिल्लीवालों को हर महीने 20 किलो लीटर पानी मुफ्त मिलेगा. पानी का संरक्षण बढ़ाने के लिए यह तय किया गया है कि जिनका पानी का इस्तेमाल इससे ज्यादा है, उन्हें पूरा बिल चुकाना होगा.
यहाँ पर वो दिल्ली को निशुल्क पानी देने के वादे को पूरा करते हुये बता रहैं हैं यधपि सत्य यह है की केवल 20% परिवार ही दिल्ली नही है! - राजनीति मे पारदर्शिता बातो से भी झलकती है यहाँ ये वक्तव्य किसी मंझे हुए नेता का लगता है!
* Please note subsidy amount is not authenticated information; estimate is based on various inputs.
Some interesting related information :
A study submitted by Chief Minsiter's previous NGO Parviartan - Where in observations it is mentioned that NO FREE or SUBSIDIESED water is the solution.
A study by TERI on Water Management in Urban cities
Is AAP really giving water “Free”? No, Telescopic tariff removes mass subsidies.
FAQ - Delhi Jal Board (from previous government regime)
With Rs 1,716-cr budget, DJB says no to subsidy
दिल्ली के साथ लगे गुड़गाँव के मेरे कार्यालय मे केवल एक तल (floor) की पानी शुध करने की मशीन (water purifier) 700 लीटर पानी एक दिन मे नाली मे उपयोग मे ना जाने लायक़ (waste) पानी को बहा देती है ओर यहाँ दिल्ली मे कोई मुख्यमंत्री बन जाता है - विडंबना !
दिल्ली के मुख्यमंत्री अनुसार निशुल्क पानी की व्यवस्था केवल मीटर लगे घरो को मिलेगी, अनुमान अनुसार इस सुविधा का लाभ दिल्ली की केवल 20% आम जनता को मिल पायेगा, बाकी कुछ ओर समय प्रतीक्षा करें! विभिन्न स्रोतो अनुसार पिछली मुख्यमंत्री भी यही सुविधा इन्ही आम जनता को लगभग 90% दे रही थी, आंकडो मे कहें तो पिछली सरकार लगभग 1500 करोड़ की राहत देती थी नयी सरकार ने उसमे 150 करोड़ बड़ा कर 1650 करोड़ कर दिया है!
यहाँ नीचे मुख्यमंत्री साहब के फसेबूक प्रष्ट का अपडेट है - इसमे छीपी राजनीति आप समझ सकते हैं!

We have fulfilled our first promise. From 1st January, all Delhi homes will get 20 Kiloliter of free water. To promote water conservation, it has been decided that families whose water consumption is more than the stipulated limit, will have to pay for the entire usage. || हमने अपना पहला वादा पूरा किया. 1 जनवरी से दिल्लीवालों को हर महीने 20 किलो लीटर पानी मुफ्त मिलेगा. पानी का संरक्षण बढ़ाने के लिए यह तय किया गया है कि जिनका पानी का इस्तेमाल इससे ज्यादा है, उन्हें पूरा बिल चुकाना होगा.
यहाँ पर वो दिल्ली को निशुल्क पानी देने के वादे को पूरा करते हुये बता रहैं हैं यधपि सत्य यह है की केवल 20% परिवार ही दिल्ली नही है! - राजनीति मे पारदर्शिता बातो से भी झलकती है यहाँ ये वक्तव्य किसी मंझे हुए नेता का लगता है!
* Please note subsidy amount is not authenticated information; estimate is based on various inputs.
Some interesting related information :
A study submitted by Chief Minsiter's previous NGO Parviartan - Where in observations it is mentioned that NO FREE or SUBSIDIESED water is the solution.
A study by TERI on Water Management in Urban cities
Is AAP really giving water “Free”? No, Telescopic tariff removes mass subsidies.
FAQ - Delhi Jal Board (from previous government regime)
With Rs 1,716-cr budget, DJB says no to subsidy
Tuesday, November 12, 2013
अरविन्द जी की आप को क्यों वोट दें?
बहुत प्रयासो के बाद भी ये समझ पाया की अरविन्द जी कौन है ओर उसकी क्या उपलब्धियाँ है ताकि जो हमे ईमानदार व भ्रष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था देना चाहता है वो है कौन? इधर उधर टटोलने के बाद कुछ निम्नलिखित जानकर मिली हैं!
1. मेगासय पुरस्कृत उभरते नेतर्तव के लिये - यहाँ यह बताना महत्वपूर्ण है की इन्हे जो पुरस्कार मिला वो सन 2000 मे स्थापित किया गया ओर उसकी पुरस्कार राशि फ़ोर्ड फाउंडेशन देता है - http://en.wikipedia.org/wiki/Ford_Foundation | निश्चित रूप से यह पुरस्कार संदेह के घेरे मे है क्योंकि इस पुरस्कार से पहले अरविन्द जी को कोई जानता नही था, ओर जिस श्रेणी के लिये उन्हे ये पुरस्कृत किया गया!
2. RTI > कुछ मित्रगण उन्हे इसको लाने का श्रेय देते हैं जबकि वास्तविकता यह है की इसे 2003 मे NDA शासन पहले ही ले आया था http://blogs.economictimes.indiatimes.com/randomaccess/entry/rti-rte-delhi-metro-cong-taking-credit-for-bjp-s-ideas
3. ईमानदार > ईमानदारी की परिभाषा व्यक्तिगत होती है और हर आदमी ईमानदार होता है जबतक की वो बेईमान सिद्ध ना हो जाये! अरविन्द जी का भूत अपने आप मे ही विचित्र है ओर इसकी जानकारी उपलब्ध नही है!
(क)किन्तु अगर उनके तत्कालीन भूत को देंखे तो पायेंगे की उनपर IAC के अनुदानो की हेराफेरी मे संदेहात्मक पाया जाता है!
अरविन्द जी ने खुद कहा है की वो अन्ना को 1 करोड़ का भुगतान देने गयी थे पर अन्ना ने मना कर दिया क्योंकि अन्ना के मन मे संदेह था की अनुदान इस रकम से अधिक था!
(ख) नैतिक हेराफेरी > 6 लाख से अधिक लोगो की पसंद वाले फ़ेसबुक पेज IAC को शासन (कांग्रेस) से गठजोड़ कर अपने पेज FWAC मे अनेतिक रूप से कब्जा लिया जिसे बाद मे IAC के लोगो ने न्यायालय मे ले जाने पर फेसबूक व अरविन्द जी ने असली स्वामित्व को लौटा दिया! - http://www.business-standard.com/article/economy-policy/india-against-corruption-assets-caught-in-tug-of-war-112092203017_1.html
(ग) राज्नेतिक हेराफेरी > अरविन्द जी आयकर विभाग के जानकर उच्च श्रेणी पर थे उन्हे विदेशो से धन प्राप्ति के बारे मे जानकारी थी फिर भी उन्होने राज्नेतिक लाभ के लिया विदेशो मे बसे लोगो को मूर्ख बनाया! http://fcra.ozg.in/2011/08/fcra-2010-foreign-contribution.html - प्रशन संख्या 9 - उत्तर संख्या E
4. क्रमढ़ व त्यागी > बहुत छानबीन के बाद भी अभी तक एक भी ऐसा कर्मश्री का कर्म दिखाई नही दिया जिसे उन्होने न्यायसंगत तरीके से परिपूर्ण किया हो - कितनी NGOs खोली ओर बंद की इसका कोई तर्कसंगत कारण दिखाई नही देता ये संस्थाएं क्या करती थी उसकी कोई प्रमाणिक जानकारी नही है! IT मे पारदर्शिता से लेकर IAC तक अरविन्द जी किसी भी काम को पूर्ण नही कर पाये हर काम को किसी नये काम के लिये त्याग दिया! बहुत से लोग एह भी मानते है की अरविन्द जी ने आयकर विभाग मे एक मोटी कमाई वाला आसन रास्ता छोड़ एक कठिन मार्ग चुना!
परन्तु वास्तविकता यह है की आज अरविन्द अधिक नाम व धनसंपदा के स्वामी हैं, मुझे उनकी नियत पर संदेह नही है पर जो उन्होने खोया उससे कहीं अधिक वो पा रहे हैं, उदाहरण के लिये जिन्दल, सिंधिया व कई ओर राजवंशी राजनेति मे हैं जिनकी प्रतिष्ठा व धन पहले से हीं उनपर थी अरविन्द जी के पास ऐसे कुछ नही था - एक लेख जो मैने पहेले लिखा था - http://tadviddhi.blogspot.in/2011/11/blog-post_17.html
अरविन्द जी IITian हैं - यह ना तो किसी की नियत का या बुद्धि का कोई मापदंड है ओर ना ही तर्कसंगत; आप को शायद आपको पता हो की श्री श्री रविशंकर के पास 100 से ज्यादा IITian अपनी सेवा प्रदान करते हैं ओर उन्हे हम जानते भी नहीं हैं! http://www.artofliving.org/in-en/interaction-dinesh-ghodke
अरविन्द जी बहुत से बाते कथित रूप से करते हैं ओर उन कथित बातो से एक भ्रम् पैदा करते है जैसे की वो ईमानदार है बाकी सब बेईमान! उदाहरण स्वरूप येद्दूरप्पा पर उन्होने भरपूर वार किये परन्तु न्यायालय ने प्राथमिक दृष्टि मे उन्हे दोष रहित माना व जमानत दे दी - "However in March 2012,the High Court of Karnataka quashed the FIR registered against him regarding the Mining scam. A division bench of high court of Karnataka passed the order stating that "Suspicion cannot be a ground to tarnish the image and reputation of a person who is holding a Constitutional post." - http://en.wikipedia.org/wiki/B._S._Yeddyurappa
इसी तरह उन्होने गडकरी के विरुध विशुध हवा मे आरोप लगाये परन्तु एक वर्ष से अधिक समय हो गया ना ही आयकर विभाग ना ही कोई ओर शासनिक विभाग उनपर लगे आरोप सिद्ध कर पाया है! यह सब अगर जानकारो की माने तो शासन की और से अरविन्द जी की सहायता से रचा गया एक षड्यंत्र था जिसे जांच BJP ने स्वयं ही करवा ली थी - http://www.rediff.com/news/column/the-strange-case-of-gadkari-and-why-gurumurthy-mattered/20121108.htm
चलिये मान लेते हैं की अरविन्द जी मे भी सभी व्यक्तियों की तरह खामियां हो सकती हैं पर आप पार्टी एक विचारधारा है जो हमे भ्रष्टाचार मुक्त शासन देगी!
चलिये मान लेते हैं की अरविन्द जी मे भी सभी व्यक्तियों की तरह खामियां हो सकती हैं पर आप पार्टी एक विचारधारा है जो हमे भ्रष्टाचार मुक्त शासन देगी!
1. आप की औपचारिक घोषणा 2 अक्टूबर को हुई ओर 29 नवम्बर, 2012 को बनी, इसके बनाने से पहले आइये देखिएँ की 30 सितंबर की मध्यरात्रि मे कथित रूप से क्या हुआ -
2. आप की अंतरिम टीम - कृपया जाने की कोशिश कीजिये कितने नाम ऐसे हैं जिनका किसी भी सकरात्मक रूप मे आप परिचय दे सकते हैं एक नाम तो खासा परेशान करता है जिसे देशद्रोह की लिये न्यायालय दोषी ठहरा चुका है वो हैं श्री बिनायक सेन - http://internal.aamaadmiparty.org/MeetTheTeam.aspx
3. आप भिन्न है > आप ने राज्नेतिक उदेशयों के लिये अनेतिक हथकंडे आपनाए! दिल्ली की 16 दिसंबर की अशोभनीय घटना का राजनेटिक करण किया और दिल्ली शासन को प्रताडित किया; एक साक्षात्कार मे अरविन्द जी ने माना की दिल्ली मे सुरक्षा (महिलानों को भी) नही दे पायेंगे क्योंकि पुलिस केन्द्र का आधीन काम करती है -
(in next with reference to this interview where Arvind referred Yogendra Yadav survey)
4. आप भिन्न है > आप ने योगेन्द्र यादव के सहयोग से कॉंग्रेसी से आप के पक्ष में सर्वे कराया - http://www.webnewswire.com/node/3545238
1. मेगासय पुरस्कृत उभरते नेतर्तव के लिये - यहाँ यह बताना महत्वपूर्ण है की इन्हे जो पुरस्कार मिला वो सन 2000 मे स्थापित किया गया ओर उसकी पुरस्कार राशि फ़ोर्ड फाउंडेशन देता है - http://en.wikipedia.org/wiki/Ford_Foundation | निश्चित रूप से यह पुरस्कार संदेह के घेरे मे है क्योंकि इस पुरस्कार से पहले अरविन्द जी को कोई जानता नही था, ओर जिस श्रेणी के लिये उन्हे ये पुरस्कृत किया गया!
2. RTI > कुछ मित्रगण उन्हे इसको लाने का श्रेय देते हैं जबकि वास्तविकता यह है की इसे 2003 मे NDA शासन पहले ही ले आया था http://blogs.economictimes.indiatimes.com/randomaccess/entry/rti-rte-delhi-metro-cong-taking-credit-for-bjp-s-ideas
3. ईमानदार > ईमानदारी की परिभाषा व्यक्तिगत होती है और हर आदमी ईमानदार होता है जबतक की वो बेईमान सिद्ध ना हो जाये! अरविन्द जी का भूत अपने आप मे ही विचित्र है ओर इसकी जानकारी उपलब्ध नही है!
(क)किन्तु अगर उनके तत्कालीन भूत को देंखे तो पायेंगे की उनपर IAC के अनुदानो की हेराफेरी मे संदेहात्मक पाया जाता है!
(ख) नैतिक हेराफेरी > 6 लाख से अधिक लोगो की पसंद वाले फ़ेसबुक पेज IAC को शासन (कांग्रेस) से गठजोड़ कर अपने पेज FWAC मे अनेतिक रूप से कब्जा लिया जिसे बाद मे IAC के लोगो ने न्यायालय मे ले जाने पर फेसबूक व अरविन्द जी ने असली स्वामित्व को लौटा दिया! - http://www.business-standard.com/article/economy-policy/india-against-corruption-assets-caught-in-tug-of-war-112092203017_1.html
(ग) राज्नेतिक हेराफेरी > अरविन्द जी आयकर विभाग के जानकर उच्च श्रेणी पर थे उन्हे विदेशो से धन प्राप्ति के बारे मे जानकारी थी फिर भी उन्होने राज्नेतिक लाभ के लिया विदेशो मे बसे लोगो को मूर्ख बनाया! http://fcra.ozg.in/2011/08/fcra-2010-foreign-contribution.html - प्रशन संख्या 9 - उत्तर संख्या E
4. क्रमढ़ व त्यागी > बहुत छानबीन के बाद भी अभी तक एक भी ऐसा कर्मश्री का कर्म दिखाई नही दिया जिसे उन्होने न्यायसंगत तरीके से परिपूर्ण किया हो - कितनी NGOs खोली ओर बंद की इसका कोई तर्कसंगत कारण दिखाई नही देता ये संस्थाएं क्या करती थी उसकी कोई प्रमाणिक जानकारी नही है! IT मे पारदर्शिता से लेकर IAC तक अरविन्द जी किसी भी काम को पूर्ण नही कर पाये हर काम को किसी नये काम के लिये त्याग दिया! बहुत से लोग एह भी मानते है की अरविन्द जी ने आयकर विभाग मे एक मोटी कमाई वाला आसन रास्ता छोड़ एक कठिन मार्ग चुना!
परन्तु वास्तविकता यह है की आज अरविन्द अधिक नाम व धनसंपदा के स्वामी हैं, मुझे उनकी नियत पर संदेह नही है पर जो उन्होने खोया उससे कहीं अधिक वो पा रहे हैं, उदाहरण के लिये जिन्दल, सिंधिया व कई ओर राजवंशी राजनेति मे हैं जिनकी प्रतिष्ठा व धन पहले से हीं उनपर थी अरविन्द जी के पास ऐसे कुछ नही था - एक लेख जो मैने पहेले लिखा था - http://tadviddhi.blogspot.in/2011/11/blog-post_17.html
अरविन्द जी IITian हैं - यह ना तो किसी की नियत का या बुद्धि का कोई मापदंड है ओर ना ही तर्कसंगत; आप को शायद आपको पता हो की श्री श्री रविशंकर के पास 100 से ज्यादा IITian अपनी सेवा प्रदान करते हैं ओर उन्हे हम जानते भी नहीं हैं! http://www.artofliving.org/in-en/interaction-dinesh-ghodke
अरविन्द जी बहुत से बाते कथित रूप से करते हैं ओर उन कथित बातो से एक भ्रम् पैदा करते है जैसे की वो ईमानदार है बाकी सब बेईमान! उदाहरण स्वरूप येद्दूरप्पा पर उन्होने भरपूर वार किये परन्तु न्यायालय ने प्राथमिक दृष्टि मे उन्हे दोष रहित माना व जमानत दे दी - "However in March 2012,the High Court of Karnataka quashed the FIR registered against him regarding the Mining scam. A division bench of high court of Karnataka passed the order stating that "Suspicion cannot be a ground to tarnish the image and reputation of a person who is holding a Constitutional post." - http://en.wikipedia.org/wiki/B._S._Yeddyurappa
इसी तरह उन्होने गडकरी के विरुध विशुध हवा मे आरोप लगाये परन्तु एक वर्ष से अधिक समय हो गया ना ही आयकर विभाग ना ही कोई ओर शासनिक विभाग उनपर लगे आरोप सिद्ध कर पाया है! यह सब अगर जानकारो की माने तो शासन की और से अरविन्द जी की सहायता से रचा गया एक षड्यंत्र था जिसे जांच BJP ने स्वयं ही करवा ली थी - http://www.rediff.com/news/column/the-strange-case-of-gadkari-and-why-gurumurthy-mattered/20121108.htm
चलिये मान लेते हैं की अरविन्द जी मे भी सभी व्यक्तियों की तरह खामियां हो सकती हैं पर आप पार्टी एक विचारधारा है जो हमे भ्रष्टाचार मुक्त शासन देगी!
चलिये मान लेते हैं की अरविन्द जी मे भी सभी व्यक्तियों की तरह खामियां हो सकती हैं पर आप पार्टी एक विचारधारा है जो हमे भ्रष्टाचार मुक्त शासन देगी!
1. आप की औपचारिक घोषणा 2 अक्टूबर को हुई ओर 29 नवम्बर, 2012 को बनी, इसके बनाने से पहले आइये देखिएँ की 30 सितंबर की मध्यरात्रि मे कथित रूप से क्या हुआ -
2. आप की अंतरिम टीम - कृपया जाने की कोशिश कीजिये कितने नाम ऐसे हैं जिनका किसी भी सकरात्मक रूप मे आप परिचय दे सकते हैं एक नाम तो खासा परेशान करता है जिसे देशद्रोह की लिये न्यायालय दोषी ठहरा चुका है वो हैं श्री बिनायक सेन - http://internal.aamaadmiparty.org/MeetTheTeam.aspx
4. आप भिन्न है > आप ने योगेन्द्र यादव के सहयोग से कॉंग्रेसी से आप के पक्ष में सर्वे कराया - http://www.webnewswire.com/node/3545238
Monday, October 7, 2013
Youth 4 Panun Kashmir: Last Expression of Nationalist Resistance in Kashm...
Youth 4 Panun Kashmir: Last Expression of Nationalist Resistance in Kashm...: The Last Expression of Nationalist Resistance in Kashmir . Don't miss to watch it as Kashmiri Pandits voice condemnation against the Jiha...
Saturday, October 5, 2013
प्याज और राजनीति - यापा है पर मजबूरी है!
केवल इस अटकलो की बीच की नवरात्र के शुभ अवसर पर प्याज का मूल्य गिर सकता है; विभीन्न राजनातिक पार्टीयो की पत्रकार वार्ता :
खानदानी पार्टी H
राहुल : जनता की भावनाओ को कम पर जेब को ज्यादा ध्यान रखते हुए सरकार ने प्याज की किम्मते कम की.
अजय : (फुसफुसाते हुए) इसमे सरकार नही माँ दुर्गा की कृपा है, नवरात्र हैं, इसलिये!
राहुल : क्योंकि इस देश मे नवरात्र कौन लाया?
पत्रकार : सर, सर, सर
राहुल जी चल दिये ओर अजय जी ने मंच संभाला
पत्रकार : नवरात्र और खानदानी पार्टी का क्या सम्बंध है?
अजय : जो राहुल जी कह रहे है वही पार्टी लाइन है और अब जब कभी भी प्याज की कीमत बढेगी सरकार अध्यादेश लाकर उस मास को नवरात्र मास घोषित करेगी!
आम कचरा पार्टी H
अरविन्द : जनता की भावनाओ को कम पर वोट को ज्यादा ध्यान रखते हुए हमने राष्ट्रपति को अनुरोध किया की वो सी बी आई से जांच कराये ताकि प्याज की की किम्मते कम हो सकैं!
कुमार : (गुनगुनाते हुए) ये कलम भी ले लो ये दवात भी ले लो, भले छिन लो मुझसे बेचेनी ये सारी पर मुझे लौटा दो वो प्यारी प्यारी प्याज की बिरयानी!
अरविन्द : हम झाडुओ के प्रयास से आम लोगो को राहत मिलेगी!
पत्रकार : सर, ये नवरात्र के कारण् प्याज मे नमी आई है?
अरविन्द : सब कोरी अफवाह है, यह क्चरा ओर झाडुओ क़े संयुक्त प्रयास व महामहिम के हस्तक्षेप से संभव हुआ है;
पत्रकार : नवरात्र और कचरा पार्टी का क्या सम्बंध है?
अरविन्द : चलिये आप कहते हैं तो नवरात्र सही पर आप पत्रकार बिके हुऐं हैं आम आदमी को कभी श्रेय नही देंगे! आप सभी को ईद मुबारक!
पत्रकार : सर नवरात्र है!
अरविन्द : हमे पता है भा ज पा ने सभी मीडिया हाउस खरीदे हुए है इसलिये आप सम्प्रादीयकता की राजनीति करते हैं, भगवान मे फर्क कैसा - हम नवरात्र मे ईद क्यों नही मना सकते!
साम्प्रदायिक पार्टी H
नेताजी : जनता की भावनाओ को कम पर वोट को ज्यादा ध्यान रखते हुए हमने अल्पसंख्यक वर्ग के लिये इस नवरात्र मे मुफ्त प्याज देने की घोषणा की है!
मुन्नाजी : और ये प्याज हमने आस्ट्रेलिया से आयात की है जिससे हमारे किसान भाइयो को मेहनत ना करनी पड़े!
नेताजी : हमने हर बहुसंख्यक समाज वाले छैत्र मैं धारा 144 घोषित कर दी है, ताकि सब लोग घर पर ही रहैं ओर नवरात्र शान्ति से मनाएं!
मुन्नाजी : हम प्रदेश मे किसी भी तरह से भाई चारे का माहौल खराब नही होंगे देंगे, ओर दोषित समुदाय व अफ़सरो के खिलाफ कड़ी कारवाई होगी!
पत्रकार : प्रदेश मे नवरात्र की क्या व्यवस्था की है!
मुन्नाजी : ये सब आप सम्बंधित अधिकारी से पूछैं - प्रदेश मे अमन और शान्ति है!
पत्रकार : आप नवरात्र और दुर्गा के प्रश्नो को टाल रहें हैं!
नेताजी : ऐसा है भैया आपको दुर्गा जी की ज्यादा चिंता है तो आप अकेले मे आइए आप को समझा देंगे की प्रशासन ने क्या कदम उढाएं हैं; आप प्रदेश के सेकुलर माहोल को खराब ना करें!
इस समय देश मे यही तीन पार्टियाँ हैं जो धर्मनिरपेक्ष व गरीब आदमियो की पार्टी हैं; बाकी पार्टीयो के बारे मे राय कोई ज्यादा अच्छी तो नही है, पर अभी समय के अभाव मे उनके प्रेसवार्ता मे जा नही पाया हूँ!
खानदानी पार्टी H
राहुल : जनता की भावनाओ को कम पर जेब को ज्यादा ध्यान रखते हुए सरकार ने प्याज की किम्मते कम की.
अजय : (फुसफुसाते हुए) इसमे सरकार नही माँ दुर्गा की कृपा है, नवरात्र हैं, इसलिये!
राहुल : क्योंकि इस देश मे नवरात्र कौन लाया?
पत्रकार : सर, सर, सर
राहुल जी चल दिये ओर अजय जी ने मंच संभाला
पत्रकार : नवरात्र और खानदानी पार्टी का क्या सम्बंध है?
अजय : जो राहुल जी कह रहे है वही पार्टी लाइन है और अब जब कभी भी प्याज की कीमत बढेगी सरकार अध्यादेश लाकर उस मास को नवरात्र मास घोषित करेगी!
आम कचरा पार्टी H
अरविन्द : जनता की भावनाओ को कम पर वोट को ज्यादा ध्यान रखते हुए हमने राष्ट्रपति को अनुरोध किया की वो सी बी आई से जांच कराये ताकि प्याज की की किम्मते कम हो सकैं!
कुमार : (गुनगुनाते हुए) ये कलम भी ले लो ये दवात भी ले लो, भले छिन लो मुझसे बेचेनी ये सारी पर मुझे लौटा दो वो प्यारी प्यारी प्याज की बिरयानी!
अरविन्द : हम झाडुओ के प्रयास से आम लोगो को राहत मिलेगी!
पत्रकार : सर, ये नवरात्र के कारण् प्याज मे नमी आई है?
अरविन्द : सब कोरी अफवाह है, यह क्चरा ओर झाडुओ क़े संयुक्त प्रयास व महामहिम के हस्तक्षेप से संभव हुआ है;
पत्रकार : नवरात्र और कचरा पार्टी का क्या सम्बंध है?
अरविन्द : चलिये आप कहते हैं तो नवरात्र सही पर आप पत्रकार बिके हुऐं हैं आम आदमी को कभी श्रेय नही देंगे! आप सभी को ईद मुबारक!
पत्रकार : सर नवरात्र है!
अरविन्द : हमे पता है भा ज पा ने सभी मीडिया हाउस खरीदे हुए है इसलिये आप सम्प्रादीयकता की राजनीति करते हैं, भगवान मे फर्क कैसा - हम नवरात्र मे ईद क्यों नही मना सकते!
साम्प्रदायिक पार्टी H
नेताजी : जनता की भावनाओ को कम पर वोट को ज्यादा ध्यान रखते हुए हमने अल्पसंख्यक वर्ग के लिये इस नवरात्र मे मुफ्त प्याज देने की घोषणा की है!
मुन्नाजी : और ये प्याज हमने आस्ट्रेलिया से आयात की है जिससे हमारे किसान भाइयो को मेहनत ना करनी पड़े!
नेताजी : हमने हर बहुसंख्यक समाज वाले छैत्र मैं धारा 144 घोषित कर दी है, ताकि सब लोग घर पर ही रहैं ओर नवरात्र शान्ति से मनाएं!
मुन्नाजी : हम प्रदेश मे किसी भी तरह से भाई चारे का माहौल खराब नही होंगे देंगे, ओर दोषित समुदाय व अफ़सरो के खिलाफ कड़ी कारवाई होगी!
पत्रकार : प्रदेश मे नवरात्र की क्या व्यवस्था की है!
मुन्नाजी : ये सब आप सम्बंधित अधिकारी से पूछैं - प्रदेश मे अमन और शान्ति है!
पत्रकार : आप नवरात्र और दुर्गा के प्रश्नो को टाल रहें हैं!
नेताजी : ऐसा है भैया आपको दुर्गा जी की ज्यादा चिंता है तो आप अकेले मे आइए आप को समझा देंगे की प्रशासन ने क्या कदम उढाएं हैं; आप प्रदेश के सेकुलर माहोल को खराब ना करें!
इस समय देश मे यही तीन पार्टियाँ हैं जो धर्मनिरपेक्ष व गरीब आदमियो की पार्टी हैं; बाकी पार्टीयो के बारे मे राय कोई ज्यादा अच्छी तो नही है, पर अभी समय के अभाव मे उनके प्रेसवार्ता मे जा नही पाया हूँ!
Tuesday, July 2, 2013
content write ups: Sanskrit- Why it is a great language?
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Wednesday, March 13, 2013
Learn Sanskrit And Read The Scriptures For Yourself!: Dharma, Artha, Kāma, Mokṣa – II 'आत्मन्'
Learn Sanskrit And Read The Scriptures For Yourself!: Dharma, Artha, Kāma, Mokṣa – II 'आत्मन्': Continuing his series " Dharma, Artha, K ā ma, Mok ṣ a," this month Bibek Debroy introduces core beliefs in Hinduism. Despi...
Thursday, September 13, 2012
जनलोकपाल, चुनाव, अन्ना ओर भारत भ्रष्टाचार के खिलाफ़!
पिछले लगभग एक वर्ष से ना सिर्फ़ देश ब्लकि आंदोलन, सूत्रधार, मीडिया ओर अन्ना ऐसे स्थिति मे पहुँच गये है, जहाँ उनसे जनलोकपाल के बारे मे पूछना गर्व का न होकर एक झुनझूलाहट का विषय बन गया है! हम गर्व की स्थिति से झुनझूलाहट की ओर विवाद की स्थिति मे क्यों है, क्यों नही हम उतने ही स्पष्ट ओर गोर्वन्तित है जितना हम पिछले वर्ष के एप्रिल माह मे थे! सबसे ज़्यादा विचारशील विषय है की इन सब विवादो मे जनलोकपाल कहाँ है? क्या अब हम जनलोकपाल छोड़कर हर विषय मे अपनी राय रखते हैं ओर जनलोकपाल को हमने चुनावी भट्टी मे झोंक दिया है अपने समय तक पकने के लिए?
वास्तीविक्ता मे ये सब सिर्फ़ या तो सिरफिरे लोगो का चिंतन विषय है या आंदोलन से जुड़े लोगो का! ये मेरा अनुमान इस आधार पर है की मेरे कार्यालय मे जहाँ 500 से 600 लोग काम करते हैं वहाँ केवल 4-6 लोग ही आंदोलन का समर्थन करते है तथा होने वाले घटनाक्रम से हताश या खुश होते हैं! ये वास्तीविक्ता उतनी ही तर्कसंगत है जितनी की किसी विषय पर poll कराने की, या फिर जो लोग यह मानते है की आंदोलन की शक्ति युवा व शिक्षित युवा पीढ़ी है! मेरे कार्यालय मे ओसत आयु 32 वर्ष व ओसत वेतन 30000 हज़ार है!
मे आपसे अपने कुछ विश्लेषण बाँटना चाहूँगा, अहसमति के आपके मौलिक अधिकार के सम्मान के साथ, बिना इस बात को नज़रअंदाज किये - यहाँ ज्ञान मत बाँटो की हम सभी ज्ञानि हैं!
जनआंदोलन : सत्य, सत्य होता है चाहे उसे 1 व्यक्ति बोले या 1 करोड़! संगठित ओर ध्येयवादि कम लोगो का समूह ज़्यादा कारगर व असरदायी होता है वनस्पीतन लाखो की भीड़ के! जब हर व्यक्ति अपने को आंदोलन का हिस्सा मानकर अपने ज्ञान का भार दूसरे के ज्ञान से ज़्यादा पाता है तो हर कोई आंदोलन को अपनी की ओर ले जाना चाहता है! जिस आंदोलन के 2010 के रचीयता बेमानी हो जाए व उसका चेहरा भी आंदोलन की दिशा जानने के लिए वोटो के लिए आश्रित हो जाए ऐसे आंदोलन की दिशा व ध्येय की आयु कितनी होगी चिंतन का विषय है! ये भी चिंतन का विषय है की जन भवाना कितने कितने समय के बाद जाननी होगी! एक काल्पनिक स्थिति को मानते हुए ये पाया जाए की अब जन समर्थन आंदोलन के साथ नही है तो क्या आंदोलन वापिस ले लेना चाहिए!
आत्म तुषटिकरण : जब से आंदोलन का संचालन श्री दिग्विजय सिंह व हमारी गेर उत्तरदायी मीडिया के पास गया, आंदोलन बचाव व दोषभाव का प्रयाय बन गया! श्री सिंह के उकसाने पर हमारे तीन सपूत आमरण अनशन पर बैठ गये ओर फिर जो हुआ हम सब उसके साक्षी हैं BEA के धमकीपूर्रन रविये पर भी हम मंच से माफी माँगते नज़र आए! मीडिया ने या फिर श्री दिग्विजय जैसे हर संस्थान के तुके बेतुके हर सवाल का उत्तर देने को लालायित नज़र आए! मेरा मानना ये है की उन्होने जनलोकपाल को छोड़कर हर वो सवाल किए जो की उन्हे राज्नेतिक व्यवस्था से करने चाहिए थे! जनलोकपाल का ये आंदोलन था ओर एक मजबूत स्थिति मे थे जहाँ ना तो श्री दिग्विजय को ना ही मीडिया को कुछ पूछना था, वो जिस इरादे से जुड़े थे उसे पूरा करे के वो दरकिन्नार हो गये! ज़रा बेतुके प्रशनो पर नज़र डालिए ओर जो उत्तर उन्हे मिले उस से क्या आंदोलन मजबूत हुआ!
क) चरित्र व निजी जीवन पर आधारित सवाल!
ख) मंच सज्जा पर क्या हो या ना हो उस पर भी बवाल
ग) मंच पर कौन बैठे ओर कौन उठे, उस पर भी संदेह
घ) भीड़ नही है, भीड़ कहाँ गयी
ङ) फ्ला फ्ला पार्टी के बारे मे आपकी राय
च) आप चुनाव क्यो नही लड़ते
ये बात स्पष्ट थी की सिर्फ़ अन्ना के अकेले ही अनशन बैठने पर हम गंतव्य तक पहुँच सकते थे, तो कैसे ये व्यापक अनशन व व्यापक जन समर्थन का आश्रित हो गया ओर जनलोकपाल से भटकर चुनाव व विश्व भर के सुधारो की ओर निकल गया!
चुनाव : एक आदर्श व कार्यवाहक दिशा, ये उतना ही प्रभावशाली है जितना की काल्पनिक! अगर हम इस स्थिति मे पहुँच जाते है जहाँ आज ना तो 110 वर्ष पूरानी कांग्रेस है, तो शायद जनलोकपाल मिल जाए! हालाँकि आज स्थिति साफ़ नही है की आंदोलन चुनाव की राह पर जाएगा या संघर्ष की! मेरे आकलन से संघर्ष की दिशा प्रभावी व तेज है! कई कारण है इस आकलन के जैसे की आप नेतिक आधार पर एक लक्ष्य को लेकर सफल होने के अधिक संभावन्ना छेत्र मे है!
वास्तीविक्ता मे ये सब सिर्फ़ या तो सिरफिरे लोगो का चिंतन विषय है या आंदोलन से जुड़े लोगो का! ये मेरा अनुमान इस आधार पर है की मेरे कार्यालय मे जहाँ 500 से 600 लोग काम करते हैं वहाँ केवल 4-6 लोग ही आंदोलन का समर्थन करते है तथा होने वाले घटनाक्रम से हताश या खुश होते हैं! ये वास्तीविक्ता उतनी ही तर्कसंगत है जितनी की किसी विषय पर poll कराने की, या फिर जो लोग यह मानते है की आंदोलन की शक्ति युवा व शिक्षित युवा पीढ़ी है! मेरे कार्यालय मे ओसत आयु 32 वर्ष व ओसत वेतन 30000 हज़ार है!
मे आपसे अपने कुछ विश्लेषण बाँटना चाहूँगा, अहसमति के आपके मौलिक अधिकार के सम्मान के साथ, बिना इस बात को नज़रअंदाज किये - यहाँ ज्ञान मत बाँटो की हम सभी ज्ञानि हैं!
जनआंदोलन : सत्य, सत्य होता है चाहे उसे 1 व्यक्ति बोले या 1 करोड़! संगठित ओर ध्येयवादि कम लोगो का समूह ज़्यादा कारगर व असरदायी होता है वनस्पीतन लाखो की भीड़ के! जब हर व्यक्ति अपने को आंदोलन का हिस्सा मानकर अपने ज्ञान का भार दूसरे के ज्ञान से ज़्यादा पाता है तो हर कोई आंदोलन को अपनी की ओर ले जाना चाहता है! जिस आंदोलन के 2010 के रचीयता बेमानी हो जाए व उसका चेहरा भी आंदोलन की दिशा जानने के लिए वोटो के लिए आश्रित हो जाए ऐसे आंदोलन की दिशा व ध्येय की आयु कितनी होगी चिंतन का विषय है! ये भी चिंतन का विषय है की जन भवाना कितने कितने समय के बाद जाननी होगी! एक काल्पनिक स्थिति को मानते हुए ये पाया जाए की अब जन समर्थन आंदोलन के साथ नही है तो क्या आंदोलन वापिस ले लेना चाहिए!
आत्म तुषटिकरण : जब से आंदोलन का संचालन श्री दिग्विजय सिंह व हमारी गेर उत्तरदायी मीडिया के पास गया, आंदोलन बचाव व दोषभाव का प्रयाय बन गया! श्री सिंह के उकसाने पर हमारे तीन सपूत आमरण अनशन पर बैठ गये ओर फिर जो हुआ हम सब उसके साक्षी हैं BEA के धमकीपूर्रन रविये पर भी हम मंच से माफी माँगते नज़र आए! मीडिया ने या फिर श्री दिग्विजय जैसे हर संस्थान के तुके बेतुके हर सवाल का उत्तर देने को लालायित नज़र आए! मेरा मानना ये है की उन्होने जनलोकपाल को छोड़कर हर वो सवाल किए जो की उन्हे राज्नेतिक व्यवस्था से करने चाहिए थे! जनलोकपाल का ये आंदोलन था ओर एक मजबूत स्थिति मे थे जहाँ ना तो श्री दिग्विजय को ना ही मीडिया को कुछ पूछना था, वो जिस इरादे से जुड़े थे उसे पूरा करे के वो दरकिन्नार हो गये! ज़रा बेतुके प्रशनो पर नज़र डालिए ओर जो उत्तर उन्हे मिले उस से क्या आंदोलन मजबूत हुआ!
क) चरित्र व निजी जीवन पर आधारित सवाल!
ख) मंच सज्जा पर क्या हो या ना हो उस पर भी बवाल
ग) मंच पर कौन बैठे ओर कौन उठे, उस पर भी संदेह
घ) भीड़ नही है, भीड़ कहाँ गयी
ङ) फ्ला फ्ला पार्टी के बारे मे आपकी राय
च) आप चुनाव क्यो नही लड़ते
ये बात स्पष्ट थी की सिर्फ़ अन्ना के अकेले ही अनशन बैठने पर हम गंतव्य तक पहुँच सकते थे, तो कैसे ये व्यापक अनशन व व्यापक जन समर्थन का आश्रित हो गया ओर जनलोकपाल से भटकर चुनाव व विश्व भर के सुधारो की ओर निकल गया!
चुनाव : एक आदर्श व कार्यवाहक दिशा, ये उतना ही प्रभावशाली है जितना की काल्पनिक! अगर हम इस स्थिति मे पहुँच जाते है जहाँ आज ना तो 110 वर्ष पूरानी कांग्रेस है, तो शायद जनलोकपाल मिल जाए! हालाँकि आज स्थिति साफ़ नही है की आंदोलन चुनाव की राह पर जाएगा या संघर्ष की! मेरे आकलन से संघर्ष की दिशा प्रभावी व तेज है! कई कारण है इस आकलन के जैसे की आप नेतिक आधार पर एक लक्ष्य को लेकर सफल होने के अधिक संभावन्ना छेत्र मे है!
Tuesday, June 19, 2012
हिंदुत्व की पालकी के नए सवार
| Monday, 28 May 2012 10:23 |
| Monday, 28 May 2012 10:23 अरुण कुमार त्रिपाठी जनसत्ता 28 मई, 2012: मुंबई में हिंदुत्व की पालकी के नए सवार ने अपने आसन पर कब्जा जमा लिया है। पुराने सवारों ने नाराजगी में ही सही, पर पालकी छोड़ दी है। यानी हिंदुत्व की नई यात्रा के लिए रास्ता साफ होता जा रहा है लेकिन उसे शुरुआती चुनौती कहारों से मिल रही है। जो सवार हो चुके थे और आगे शाही सवारी करना चाहते थे, वे तो अब कंधा देने से रहे और जब कहार सवार बन चुके हैं तो नए कंधे कहां से मिलेंगे? जनाधारहीन नेता संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर का रास्ता दिखा कर नरेंद्र भाई मोदी ने यह तो बता दिया है कि पार्टी की असली ताकत किसके पास है। नितिन गडकरी भले ही दोबारा अध्यक्ष बन गए हों और संजय जोशी को अपने लोकसभा चुनाव के लिए मैनेजर के तौर पर साथ रखना चाहते हों लेकिन पार्टी अध्यक्ष के तौर पर वे उनका पुनर्वास कराने में सफल नहीं हो पाए। वजह साफ है कि संजय जोशी ने 2001 में उस समय नरेंद्र मोदी के खिलाफ गोलबंदी शुरू कर दी थी जब केशुभाई को हटा कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। मोदी अपने विरोधियों को माफ नहीं साफ कर देते हैं। वही क्षेत्रीय स्तर पर केशुभाई के साथ हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर संजय जोशी से शुरू हुआ यह सिलसिला किसी तक जा सकता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद मुंबई की रैली से जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे राष्ट्रीय नेता छोटे-छोटे और नाकाफी कारणों से गैरहाजिर रहे और मंच पर नरेंद्र मोदी का एकछत्र दबदबा दिखा, उससे साफ है कि भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना है कि यह युग राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से होता हुआ राष्ट्रीय स्तर पर विजय प्राप्त करता है या पार्टी के आंतरिक सत्ता संघर्ष और फिर राजग के सैद्धांतिक और व्यावाहारिक विवादों में फंस कर क्षतिग्रस्त हो जाता है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय फलक पर नरेंद्र मोदी का उभरना तीन प्रकार के राजनीतिक बदलावों का संकेत है। पहला यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थोड़ी बहुत खींचतान के बावजूद भाजपा कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा को साधेगी। संघ परिवार तो वह सपना वर्षों से देख रहा है लेकिन नरेंद्र मोदी को उस सपने की सवारी आ गई है। दूसरा संदेश यह भी है कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल के भीतर राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभाव समाप्त हो चुका है और उसकी जगह क्षेत्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय रूपांतरण कर रहा है। तीसरी बात जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है वह यह कि जो पिछड़ी जातियां हिंदुत्व का सिद्धांत गढ़ने वाली अगड़ी जातियों की पालकी का बोझ ढोती फिरती थीं अब वे स्वयं सवारी करना चाहती हैं। उन्होंने उसके लिए पर्याप्त दमखम तैयार कर लिया है। अगर अगड़ी जातियां पालकी ढोने को नहीं तैयार होंगी तो वे उसके लिए भी इंतजाम कर लेंगी। मुंबई में भाजपा नेतृत्व का जो ढांचा उभरता दिखा वह स्पष्ट तौर पर क्षेत्रीय क्षत्रपों के राष्ट्रीयकरण का संकेत है और पिछडेÞ नेतृत्व के सांस्कृतीकरण का संकेत भी। यह परिघटना कुछ वैसी ही है जैसी विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं की राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती अहमियत या देश के कई क्षेत्रीय अखबारों का राष्ट्रीय बनना। भाजपा के भीतर सवर्ण और अवर्ण नेतृत्व के बीच आदर, प्रेम और अनुशासन के रिश्ते के साथ-साथ एक प्रकार की खींचतान का संबंध लंबे समय से रहा है। सवर्ण नेतृत्व की हिंदुत्व की परियोजना के योद्धा बन कर पिछड़ों ने उसे ताकत दी तो वे सत्ता और संगठन में अपना हिस्सा भी मांगते रहे। उसमें वे एक सीमा तक ही सफल हो पाते थे क्योंकि सत्ता-संघर्ष में उनका संयम जवाब दे जाता था और वे राष्ट्रीय नेतृत्व से खुले टकराव में बिखर जाते थे। अगर भाजपा में कट्टर हिंदुत्व ही राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का आधार होता तो कल्याण सिंह कब के बड़े नेता हो चुके थे। क्योंकि 2002 की सांप्रदायिक हिंसा की जिस घटना का नफा-नुकसान उठा कर नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर उठे उसके मुकाबले 1992 की घटना तो बहुत बड़ी थी। बल्कि 2002 की जड़ में तो वही घटना थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए कल्याण सिंह का नाम चला भी लेकिन वे उपाध्यक्ष तक पहुंच कर रह गए। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वी सवर्ण नेताओं को काबू में नहीं रख पाए और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य सवर्ण नेता से टकरा कर किनारे हो गए। कुछ ऐसा ही हश्र उमा भारती का भी हुआ। वे राष्ट्रीय स्तर पर आडवाणी से टकरा गर्इं और हाराकीरी कर बैठीं। ऐसा ही कुछ बीएस येदियुरप्पा भी कर रहे हैं। लेकिन गनीमत है कि उन्हें उद्धारक के तौर पर नरेंद्र मोदी मिल गए हैं। मोदी भी कल्याण सिंह, उमा भारती और येदियुरप्पा की तरह स्वतंत्र स्वभाव के पिछडेÞ नेता हैं। वे भी अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आडवाणी को चुनौती देते रहे हैं। लेकिन यह उनकी फितरत और राजनीतिक कौशल है कि वे हिंदुत्व की योजना में इस्तेमाल होते हुए भी उसके शिकार नहीं हुए। उन्होंने उन लोगों को शिकार बनाया जो उनके माध्यम से शिकार करते हुए उन्हें शिकार बनाना चाहते थे। यह बात जाहिर है कि अटल बिहारी वाजपेयी 2002 के दंगों के बाद उन्हें हटाना चाहते थे लेकिन नहीं हटा पाए। वाजपेयी ने उन्हें जिस राजधर्म के पालन की सलाह दी थी, उसे उन्होंने नहीं अपनाया, फिर भी टिके रहे। संघ परिवार ने जिस शेर की सवारी करनी चाही थी आज वही उस पर सवार हो गया है। संघ की इस योजना और उसकी दुविधा को व्यक्त करने के लिए राजनीति शास्त्री कांचा इलैया की टिप्पणी मौजूं है- हिंदुत्व की मुख्य समस्या यह थी कि शूद्रों और अन्य पिछड़ा वर्ग को किस तरह बराबरी का आध्यात्मिक हक दिए बिना अपने दायरे में लाया जाए। यह बात सही है कि अन्य दलों के मुकाबले भाजपा ने अन्य पिछड़ा वर्ग को अपने भीतर जगह देते हुए उसे ज्यादा आकर्षित किया, क्योंकि वह समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के जटिल यूरोपीय विमर्शों के बजाय देशी जुबान बोल रही थी। यह सिलसिला 1951 में बने जनसंघ के समय से ही चल रहा था। दूसरी तरफ मोदी के टिके रहने और मजबूती पाने के पीछे की वजहें बताते हुए कांचा इलैया कहते हैं- लगता है मोदी ने यह अहसास कर लिया कि त्याग और बलिदान नहीं, हिंसा का हथियार ही किसी व्यक्ति को नायक बना सकता है और धर्म के सामाजिक मूल्य जीतने वाले के साथ जुड़ते हैं न कि हारने वाले के साथ। लेकिन जो नरेंद्र मोदी कभी लालकृष्ण आडवाणी के रथ को सोमनाथ से अयोध्या लेकर गए थे और फिर उन्होंने 2002 में उसकी नई पताका फहराई, वे ही अब हिंदुत्व के रथ को अयोध्या से अमदाबाद ले जाना चाहते हैं। वडोदरा ले जाना चाहते हैं। वे वहां का विकास दिखाना चाहते हैं और बताना चाहते हैं कि किस तरह सिंगूर और नंदीग्राम से भगाए गए उद्योग वहां आए और किस तरह उन्होंने सूखे पर नियंत्रण किया जिसे महाराष्ट्र और देश के दूसरे राज्य काबू नहीं कर पाए। अगर वे उस रथ को सोमनाथ ले भी जाना चाहते हैं तो उस सोमनाथ, जिसके ब्रांड अंबेसडर अमिताभ बच्चन हैं, न कि वह सोमनाथ जहां गजनी ने हमला किया था। वे लगातार विजय और विकास की भाषा बोल रहे हैं, न कि उत्पीड़न और प्रताड़ना की। वे गुजरात को विकास का मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं। इसी से वे भी ब्रांड बने हैं और तभी अमेरिका की टाइम पत्रिका उन्हें ‘काम करने वाला आदमी’ बता कर अपने आवरण पर छापती है। मोदी गुजरात के आर्थिक विकास को पूरे देश में मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं बिना यह समझे हुए कि देश महज गुजरात नहीं है। यही कारण है कि आर्थिक मामलों पर लालकृष्ण आडवाणी की भाषा उनसे अलग है और वे कहते हैं कि भाजपा को अब एक योजना बना कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को दिशा देनी चाहिए। लोग बहुत दिक्कत में हैं। वे हमारी तरफ उम्मीद से देख रहे हैं, हमें उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहिए। देश का कांग्रेस-विरोधी मानस उसे मौका दे रहा है और उसे इसका फायदा उठाना चाहिए। भाजपा में मोदी युग के आरंभ होने से कांग्रेस में इस बात पर खुशी है कि चलो अब तृणमूल कांग्रेस उसकी तरफ ज्यादा आकर्षित नहीं होगी और जनता दल (एकी) जैसी पार्टियां भी दूरी बनाएंगी। इस तरह उसे अपनी धर्मनिरपेक्षता दिखा कर जहां वाममोर्चा के हमले को कुंद करने में मदद मिलेगी वहीं यूपीए के भीतरी और बाहरी घटकों को बांधने में और सुविधा होगी। मोदी से अल्पसंख्यकों की नाराजगी का आलम तमाम राजनीतिक दल गुजरात की तारीफ करने के बाद दारुल उलूम देवबंद के कुलपति वस्तानवी के हश्र के तौर पर देख भी चुके हैं। लेकिन कांग्रेस यह भूल रही है कि मोदी हिंदुत्व ही नहीं उदारीकरण के भी आक्रामक पैरोकार हैं। कांग्रेस अगर उदारीकरण पर धीमी चाल चलती है तो कॉरपोरेट लॉबी ही नहीं मध्यवर्ग का भी बाजारवादी हिस्सा उससे कटता है और अगर तेज चलती है तो सामान्य जनता के साथ तमाम राजनीतिक दल उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। इस बीच भ्रष्टाचार-विरोधी और लोकपाल-समर्थक आंदोलन खडेÞ हो जाते हैं या खडेÞ किए जाते हैं जो मोदी को आदर्श बताते हैं। भाजपा इन दोनों मौकों को लपकने के लिए तैयार बैठी है। लेकिन पार्टी का नेतृत्व हथिया लेने वाले मोदी यह भूल रहे हैं कि इस देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेतृत्व का विचित्र विभाजन रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की क्षेत्रीय जड़ें कमजोर भले हुई हों और वह समाप्त भी हो गया हो लेकिन किसी क्षेत्रीय नेता को अब तक राष्ट्रीय नेता बनते देखा नहीं गया। वह राष्ट्रीय दबाव भले बना ले जाता हो और हो सकता है कि देवगौड़ा की तरह कभी प्रधानमंत्री भी बन जाता हो लेकिन एक अखिल भारतीय प्रभाव नहीं छोड़ पाता। मोदी अगर राष्ट्रीय नेता बनने में सफल होते हैं तो भाजपा के भीतर ही नहीं, बाहर भी, राष्ट्रीय राजनीति में नए तरह का रूपांतरण होगा। मोदी का बहाना लेकर तमाम पिछडेÞ नेता कांग्रेस में अपनी अहमियत बढ़ाने का दबाव बनाएंगे। यानी अब हिंदू बनाम हिंदू यानी उदारता और कट्टरता की लड़ाई सवर्ण और अवर्ण के बीच नहीं, अवर्णों के बीच ही लड़ी जाएगी। सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता दोनों उनके हथियार हैं। ऐसे में अपना महत्त्व खोती जा रही और भाजपा से काफी उम्मीद पाले रही सवर्ण राजनीति भी अण्णा हजारे और रामदेव के साथ मिल कर कुछ कर सकती है। मंडल आयोग की रपट लागू होने के बाद उसने उदारीकरण और मंदिर आंदोलन को अपना हथियार बनाया था। पर अब वे हथियार उसके हाथ से निकल चुके हैं। देखना है संघ परिवार उसे सत्ता में हिस्सेदारी देता है या प्रचारक बना कर छोड़ देता है। या कांग्रेस पार्टी उसके लिए कोई भूमिका तैयार करती है। क्योंकि वह हिंदुत्व के नए सवार की पालकी ढोने से हिचक रहा है और सवारी उसे मिलने से रही। अरुण कुमार त्रिपाठी जनसत्ता 28 मई, 2012: मुंबई में हिंदुत्व की पालकी के नए सवार ने अपने आसन पर कब्जा जमा लिया है। पुराने सवारों ने नाराजगी में ही सही, पर पालकी छोड़ दी है। यानी हिंदुत्व की नई यात्रा के लिए रास्ता साफ होता जा रहा है लेकिन उसे शुरुआती चुनौती कहारों से मिल रही है। जो सवार हो चुके थे और आगे शाही सवारी करना चाहते थे, वे तो अब कंधा देने से रहे और जब कहार सवार बन चुके हैं तो नए कंधे कहां से मिलेंगे? जनाधारहीन नेता संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर का रास्ता दिखा कर नरेंद्र भाई मोदी ने यह तो बता दिया है कि पार्टी की असली ताकत किसके पास है। नितिन गडकरी भले ही दोबारा अध्यक्ष बन गए हों और संजय जोशी को अपने लोकसभा चुनाव के लिए मैनेजर के तौर पर साथ रखना चाहते हों लेकिन पार्टी अध्यक्ष के तौर पर वे उनका पुनर्वास कराने में सफल नहीं हो पाए। वजह साफ है कि संजय जोशी ने 2001 में उस समय नरेंद्र मोदी के खिलाफ गोलबंदी शुरू कर दी थी जब केशुभाई को हटा कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। मोदी अपने विरोधियों को माफ नहीं साफ कर देते हैं। वही क्षेत्रीय स्तर पर केशुभाई के साथ हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर संजय जोशी से शुरू हुआ यह सिलसिला किसी तक जा सकता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद मुंबई की रैली से जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे राष्ट्रीय नेता छोटे-छोटे और नाकाफी कारणों से गैरहाजिर रहे और मंच पर नरेंद्र मोदी का एकछत्र दबदबा दिखा, उससे साफ है कि भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना है कि यह युग राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से होता हुआ राष्ट्रीय स्तर पर विजय प्राप्त करता है या पार्टी के आंतरिक सत्ता संघर्ष और फिर राजग के सैद्धांतिक और व्यावाहारिक विवादों में फंस कर क्षतिग्रस्त हो जाता है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय फलक पर नरेंद्र मोदी का उभरना तीन प्रकार के राजनीतिक बदलावों का संकेत है। पहला यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थोड़ी बहुत खींचतान के बावजूद भाजपा कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा को साधेगी। संघ परिवार तो वह सपना वर्षों से देख रहा है लेकिन नरेंद्र मोदी को उस सपने की सवारी आ गई है। दूसरा संदेश यह भी है कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल के भीतर राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभाव समाप्त हो चुका है और उसकी जगह क्षेत्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय रूपांतरण कर रहा है। तीसरी बात जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है वह यह कि जो पिछड़ी जातियां हिंदुत्व का सिद्धांत गढ़ने वाली अगड़ी जातियों की पालकी का बोझ ढोती फिरती थीं अब वे स्वयं सवारी करना चाहती हैं। उन्होंने उसके लिए पर्याप्त दमखम तैयार कर लिया है। अगर अगड़ी जातियां पालकी ढोने को नहीं तैयार होंगी तो वे उसके लिए भी इंतजाम कर लेंगी। मुंबई में भाजपा नेतृत्व का जो ढांचा उभरता दिखा वह स्पष्ट तौर पर क्षेत्रीय क्षत्रपों के राष्ट्रीयकरण का संकेत है और पिछडेÞ नेतृत्व के सांस्कृतीकरण का संकेत भी। यह परिघटना कुछ वैसी ही है जैसी विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं की राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती अहमियत या देश के कई क्षेत्रीय अखबारों का राष्ट्रीय बनना। भाजपा के भीतर सवर्ण और अवर्ण नेतृत्व के बीच आदर, प्रेम और अनुशासन के रिश्ते के साथ-साथ एक प्रकार की खींचतान का संबंध लंबे समय से रहा है। सवर्ण नेतृत्व की हिंदुत्व की परियोजना के योद्धा बन कर पिछड़ों ने उसे ताकत दी तो वे सत्ता और संगठन में अपना हिस्सा भी मांगते रहे। उसमें वे एक सीमा तक ही सफल हो पाते थे क्योंकि सत्ता-संघर्ष में उनका संयम जवाब दे जाता था और वे राष्ट्रीय नेतृत्व से खुले टकराव में बिखर जाते थे। अगर भाजपा में कट्टर हिंदुत्व ही राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का आधार होता तो कल्याण सिंह कब के बड़े नेता हो चुके थे। क्योंकि 2002 की सांप्रदायिक हिंसा की जिस घटना का नफा-नुकसान उठा कर नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर उठे उसके मुकाबले 1992 की घटना तो बहुत बड़ी थी। बल्कि 2002 की जड़ में तो वही घटना थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए कल्याण सिंह का नाम चला भी लेकिन वे उपाध्यक्ष तक पहुंच कर रह गए। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वी सवर्ण नेताओं को काबू में नहीं रख पाए और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य सवर्ण नेता से टकरा कर किनारे हो गए। कुछ ऐसा ही हश्र उमा भारती का भी हुआ। वे राष्ट्रीय स्तर पर आडवाणी से टकरा गर्इं और हाराकीरी कर बैठीं। ऐसा ही कुछ बीएस येदियुरप्पा भी कर रहे हैं। लेकिन गनीमत है कि उन्हें उद्धारक के तौर पर नरेंद्र मोदी मिल गए हैं। मोदी भी कल्याण सिंह, उमा भारती और येदियुरप्पा की तरह स्वतंत्र स्वभाव के पिछडेÞ नेता हैं। वे भी अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आडवाणी को चुनौती देते रहे हैं। लेकिन यह उनकी फितरत और राजनीतिक कौशल है कि वे हिंदुत्व की योजना में इस्तेमाल होते हुए भी उसके शिकार नहीं हुए। उन्होंने उन लोगों को शिकार बनाया जो उनके माध्यम से शिकार करते हुए उन्हें शिकार बनाना चाहते थे। यह बात जाहिर है कि अटल बिहारी वाजपेयी 2002 के दंगों के बाद उन्हें हटाना चाहते थे लेकिन नहीं हटा पाए। वाजपेयी ने उन्हें जिस राजधर्म के पालन की सलाह दी थी, उसे उन्होंने नहीं अपनाया, फिर भी टिके रहे। संघ परिवार ने जिस शेर की सवारी करनी चाही थी यह सिलसिला 1951 में बने जनसंघ के समय से ही चल रहा था। दूसरी तरफ मोदी के टिके रहने और मजबूती पाने के पीछे की वजहें बताते हुए कांचा इलैया कहते हैं- लगता है मोदी ने यह अहसास कर लिया कि त्याग और बलिदान नहीं, हिंसा का हथियार ही किसी व्यक्ति को नायक बना सकता है और धर्म के सामाजिक मूल्य जीतने वाले के साथ जुड़ते हैं न कि हारने वाले के साथ। लेकिन जो नरेंद्र मोदी कभी लालकृष्ण आडवाणी के रथ को सोमनाथ से अयोध्या लेकर गए थे और फिर उन्होंने 2002 में उसकी नई पताका फहराई, वे ही अब हिंदुत्व के रथ को अयोध्या से अमदाबाद ले जाना चाहते हैं। वडोदरा ले जाना चाहते हैं। वे वहां का विकास दिखाना चाहते हैं और बताना चाहते हैं कि किस तरह सिंगूर और नंदीग्राम से भगाए गए उद्योग वहां आए और किस तरह उन्होंने सूखे पर नियंत्रण किया जिसे महाराष्ट्र और देश के दूसरे राज्य काबू नहीं कर पाए। अगर वे उस रथ को सोमनाथ ले भी जाना चाहते हैं तो उस सोमनाथ, जिसके ब्रांड अंबेसडर अमिताभ बच्चन हैं, न कि वह सोमनाथ जहां गजनी ने हमला किया था। वे लगातार विजय और विकास की भाषा बोल रहे हैं, न कि उत्पीड़न और प्रताड़ना की। वे गुजरात को विकास का मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं। इसी से वे भी ब्रांड बने हैं और तभी अमेरिका की टाइम पत्रिका उन्हें ‘काम करने वाला आदमी’ बता कर अपने आवरण पर छापती है। मोदी गुजरात के आर्थिक विकास को पूरे देश में मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं बिना यह समझे हुए कि देश महज गुजरात नहीं है। यही कारण है कि आर्थिक मामलों पर लालकृष्ण आडवाणी की भाषा उनसे अलग है और वे कहते हैं कि भाजपा को अब एक योजना बना कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को दिशा देनी चाहिए। लोग बहुत दिक्कत में हैं। वे हमारी तरफ उम्मीद से देख रहे हैं, हमें उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहिए। देश का कांग्रेस-विरोधी मानस उसे मौका दे रहा है और उसे इसका फायदा उठाना चाहिए। भाजपा में मोदी युग के आरंभ होने से कांग्रेस में इस बात पर खुशी है कि चलो अब तृणमूल कांग्रेस उसकी तरफ ज्यादा आकर्षित नहीं होगी और जनता दल (एकी) जैसी पार्टियां भी दूरी बनाएंगी। इस तरह उसे अपनी धर्मनिरपेक्षता दिखा कर जहां वाममोर्चा के हमले को कुंद करने में मदद मिलेगी वहीं यूपीए के भीतरी और बाहरी घटकों को बांधने में और सुविधा होगी। मोदी से अल्पसंख्यकों की नाराजगी का आलम तमाम राजनीतिक दल गुजरात की तारीफ करने के बाद दारुल उलूम देवबंद के कुलपति वस्तानवी के हश्र के तौर पर देख भी चुके हैं। लेकिन कांग्रेस यह भूल रही है कि मोदी हिंदुत्व ही नहीं उदारीकरण के भी आक्रामक पैरोकार हैं। कांग्रेस अगर उदारीकरण पर धीमी चाल चलती है तो कॉरपोरेट लॉबी ही नहीं मध्यवर्ग का भी बाजारवादी हिस्सा उससे कटता है और अगर तेज चलती है तो सामान्य जनता के साथ तमाम राजनीतिक दल उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। इस बीच भ्रष्टाचार-विरोधी और लोकपाल-समर्थक आंदोलन खडेÞ हो जाते हैं या खडेÞ किए जाते हैं जो मोदी को आदर्श बताते हैं। भाजपा इन दोनों मौकों को लपकने के लिए तैयार बैठी है। लेकिन पार्टी का नेतृत्व हथिया लेने वाले मोदी यह भूल रहे हैं कि इस देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेतृत्व का विचित्र विभाजन रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की क्षेत्रीय जड़ें कमजोर भले हुई हों और वह समाप्त भी हो गया हो लेकिन किसी क्षेत्रीय नेता को अब तक राष्ट्रीय नेता बनते देखा नहीं गया। वह राष्ट्रीय दबाव भले बना ले जाता हो और हो सकता है कि देवगौड़ा की तरह कभी प्रधानमंत्री भी बन जाता हो लेकिन एक अखिल भारतीय प्रभाव नहीं छोड़ पाता। मोदी अगर राष्ट्रीय नेता बनने में सफल होते हैं तो भाजपा के भीतर ही नहीं, बाहर भी, राष्ट्रीय राजनीति में नए तरह का रूपांतरण होगा। मोदी का बहाना लेकर तमाम पिछडेÞ नेता कांग्रेस में अपनी अहमियत बढ़ाने का दबाव बनाएंगे। यानी अब हिंदू बनाम हिंदू यानी उदारता और कट्टरता की लड़ाई सवर्ण और अवर्ण के बीच नहीं, अवर्णों के बीच ही लड़ी जाएगी। सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता दोनों उनके हथियार हैं। ऐसे में अपना महत्त्व खोती जा रही और भाजपा से काफी उम्मीद पाले रही सवर्ण राजनीति भी अण्णा हजारे और रामदेव के साथ मिल कर कुछ कर सकती है। मंडल आयोग की रपट लागू होने के बाद उसने उदारीकरण और मंदिर आंदोलन को अपना हथियार बनाया था। पर अब वे हथियार उसके हाथ से निकल चुके हैं। देखना है संघ परिवार उसे सत्ता में हिस्सेदारी देता है या प्रचारक बना कर छोड़ देता है। या कांग्रेस पार्टी उसके लिए कोई भूमिका तैयार करती है। क्योंकि वह हिंदुत्व के नए सवार की पालकी ढोने से हिचक रहा है और सवारी उसे मिलने से रही। |
Monday, 28 May 2012 10:23
अरुण कुमार त्रिपाठी
जनसत्ता 28 मई, 2012: मुंबई में हिंदुत्व की पालकी के नए सवार ने अपने आसन पर कब्जा जमा लिया है। पुराने सवारों ने नाराजगी में ही सही, पर पालकी छोड़ दी है। यानी हिंदुत्व की नई यात्रा के लिए रास्ता साफ होता जा रहा है लेकिन उसे शुरुआती चुनौती कहारों से मिल रही है। जो सवार हो चुके थे और आगे शाही सवारी करना चाहते थे, वे तो अब कंधा देने से रहे और जब कहार सवार बन चुके हैं तो नए कंधे कहां से मिलेंगे? जनाधारहीन नेता संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर का रास्ता दिखा कर नरेंद्र भाई मोदी ने यह तो बता दिया है कि पार्टी की असली ताकत किसके पास है। नितिन गडकरी भले ही दोबारा अध्यक्ष बन गए हों और संजय जोशी को अपने लोकसभा चुनाव के लिए मैनेजर के तौर पर साथ रखना चाहते हों लेकिन पार्टी अध्यक्ष के तौर पर वे उनका पुनर्वास कराने में सफल नहीं हो पाए। वजह साफ है कि संजय जोशी ने 2001 में उस समय नरेंद्र मोदी के खिलाफ गोलबंदी शुरू कर दी थी जब केशुभाई को हटा कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। मोदी अपने विरोधियों को माफ नहीं साफ कर देते हैं। वही क्षेत्रीय स्तर पर केशुभाई के साथ हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर संजय जोशी से शुरू हुआ यह सिलसिला किसी तक जा सकता है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद मुंबई की रैली से जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे राष्ट्रीय नेता छोटे-छोटे और नाकाफी कारणों से गैरहाजिर रहे और मंच पर नरेंद्र मोदी का एकछत्र दबदबा दिखा, उससे साफ है कि भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना है कि यह युग राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से होता हुआ राष्ट्रीय स्तर पर विजय प्राप्त करता है या पार्टी के आंतरिक सत्ता संघर्ष और फिर राजग के सैद्धांतिक और व्यावाहारिक विवादों में फंस कर क्षतिग्रस्त हो जाता है।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय फलक पर नरेंद्र मोदी का उभरना तीन प्रकार के राजनीतिक बदलावों का संकेत है। पहला यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थोड़ी बहुत खींचतान के बावजूद भाजपा कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा को साधेगी। संघ परिवार तो वह सपना वर्षों से देख रहा है लेकिन नरेंद्र मोदी को उस सपने की सवारी आ गई है। दूसरा संदेश यह भी है कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल के भीतर राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभाव समाप्त हो चुका है और उसकी जगह क्षेत्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय रूपांतरण कर रहा है। तीसरी बात जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है वह यह कि जो पिछड़ी जातियां हिंदुत्व का सिद्धांत गढ़ने वाली अगड़ी जातियों की पालकी का बोझ ढोती फिरती थीं अब वे स्वयं सवारी करना चाहती हैं। उन्होंने उसके लिए पर्याप्त दमखम तैयार कर लिया है। अगर अगड़ी जातियां पालकी ढोने को नहीं तैयार होंगी तो वे उसके लिए भी इंतजाम कर लेंगी।
मुंबई में भाजपा नेतृत्व का जो ढांचा उभरता दिखा वह स्पष्ट तौर पर क्षेत्रीय क्षत्रपों के राष्ट्रीयकरण का संकेत है और पिछडेÞ नेतृत्व के सांस्कृतीकरण का संकेत भी। यह परिघटना कुछ वैसी ही है जैसी विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं की राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती अहमियत या देश के कई क्षेत्रीय अखबारों का राष्ट्रीय बनना। भाजपा के भीतर सवर्ण और अवर्ण नेतृत्व के बीच आदर, प्रेम और अनुशासन के रिश्ते के साथ-साथ एक प्रकार की खींचतान का संबंध लंबे समय से रहा है। सवर्ण नेतृत्व की हिंदुत्व की परियोजना के योद्धा बन कर पिछड़ों ने उसे ताकत दी तो वे सत्ता और संगठन में अपना हिस्सा भी मांगते रहे। उसमें वे एक सीमा तक ही सफल हो पाते थे क्योंकि सत्ता-संघर्ष में उनका संयम जवाब दे जाता था और वे राष्ट्रीय नेतृत्व से खुले टकराव में बिखर जाते थे।
अगर भाजपा में कट्टर हिंदुत्व ही राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का आधार होता तो कल्याण सिंह कब के बड़े नेता हो चुके थे। क्योंकि 2002 की सांप्रदायिक हिंसा की जिस घटना का नफा-नुकसान उठा कर नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर उठे उसके मुकाबले 1992 की घटना तो बहुत बड़ी थी। बल्कि 2002 की जड़ में तो वही घटना थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए कल्याण सिंह का नाम चला भी लेकिन वे उपाध्यक्ष तक पहुंच कर रह गए।
कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वी सवर्ण नेताओं को काबू में नहीं रख पाए और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य सवर्ण नेता से टकरा कर किनारे हो गए। कुछ ऐसा ही हश्र उमा भारती का भी हुआ। वे राष्ट्रीय स्तर पर आडवाणी से टकरा गर्इं और हाराकीरी कर बैठीं। ऐसा ही कुछ बीएस येदियुरप्पा भी कर रहे हैं। लेकिन गनीमत है कि उन्हें उद्धारक के तौर पर नरेंद्र मोदी मिल गए हैं।
मोदी भी कल्याण सिंह, उमा भारती और येदियुरप्पा की तरह स्वतंत्र स्वभाव के पिछडेÞ नेता हैं। वे भी अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आडवाणी को चुनौती देते रहे हैं। लेकिन यह उनकी फितरत और राजनीतिक कौशल है कि वे हिंदुत्व की योजना में इस्तेमाल होते हुए भी उसके शिकार नहीं हुए। उन्होंने उन लोगों को शिकार बनाया जो उनके माध्यम से शिकार करते हुए उन्हें शिकार बनाना चाहते थे। यह बात जाहिर है कि अटल बिहारी वाजपेयी 2002 के दंगों के बाद उन्हें हटाना चाहते थे लेकिन नहीं हटा पाए। वाजपेयी ने उन्हें जिस राजधर्म के पालन की सलाह दी थी, उसे उन्होंने नहीं अपनाया, फिर भी टिके रहे।
संघ परिवार ने जिस शेर की सवारी करनी चाही थी
आज वही उस पर सवार हो गया है। संघ की इस योजना और उसकी दुविधा को व्यक्त करने के लिए राजनीति शास्त्री कांचा इलैया की टिप्पणी मौजूं है- हिंदुत्व की मुख्य समस्या यह थी कि शूद्रों और अन्य पिछड़ा वर्ग को किस तरह बराबरी का आध्यात्मिक हक दिए बिना अपने दायरे में लाया जाए। यह बात सही है कि अन्य दलों के मुकाबले भाजपा ने अन्य पिछड़ा वर्ग को अपने भीतर जगह देते हुए उसे ज्यादा आकर्षित किया, क्योंकि वह समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के जटिल यूरोपीय विमर्शों के बजाय देशी जुबान बोल रही थी।
यह सिलसिला 1951 में बने जनसंघ के समय से ही चल रहा था। दूसरी तरफ मोदी के टिके रहने और मजबूती पाने के पीछे की वजहें बताते हुए कांचा इलैया कहते हैं- लगता है मोदी ने यह अहसास कर लिया कि त्याग और बलिदान नहीं, हिंसा का हथियार ही किसी व्यक्ति को नायक बना सकता है और धर्म के सामाजिक मूल्य जीतने वाले के साथ जुड़ते हैं न कि हारने वाले के साथ।
लेकिन जो नरेंद्र मोदी कभी लालकृष्ण आडवाणी के रथ को सोमनाथ से अयोध्या लेकर गए थे और फिर उन्होंने 2002 में उसकी नई पताका फहराई, वे ही अब हिंदुत्व के रथ को अयोध्या से अमदाबाद ले जाना चाहते हैं। वडोदरा ले जाना चाहते हैं। वे वहां का विकास दिखाना चाहते हैं और बताना चाहते हैं कि किस तरह सिंगूर और नंदीग्राम से भगाए गए उद्योग वहां आए और किस तरह उन्होंने सूखे पर नियंत्रण किया जिसे महाराष्ट्र और देश के दूसरे राज्य काबू नहीं कर पाए। अगर वे उस रथ को सोमनाथ ले भी जाना चाहते हैं तो उस सोमनाथ, जिसके ब्रांड अंबेसडर अमिताभ बच्चन हैं, न कि वह सोमनाथ जहां गजनी ने हमला किया था। वे लगातार विजय और विकास की भाषा बोल रहे हैं, न कि उत्पीड़न और प्रताड़ना की। वे गुजरात को विकास का मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं। इसी से वे भी ब्रांड बने हैं और तभी अमेरिका की टाइम पत्रिका उन्हें ‘काम करने वाला आदमी’ बता कर अपने आवरण पर छापती है।
मोदी गुजरात के आर्थिक विकास को पूरे देश में मॉडल बना कर पेश कर रहे हैं बिना यह समझे हुए कि देश महज गुजरात नहीं है। यही कारण है कि आर्थिक मामलों पर लालकृष्ण आडवाणी की भाषा उनसे अलग है और वे कहते हैं कि भाजपा को अब एक योजना बना कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को दिशा देनी चाहिए। लोग बहुत दिक्कत में हैं। वे हमारी तरफ उम्मीद से देख रहे हैं, हमें उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहिए। देश का कांग्रेस-विरोधी मानस उसे मौका दे रहा है और उसे इसका फायदा उठाना चाहिए।
भाजपा में मोदी युग के आरंभ होने से कांग्रेस में इस बात पर खुशी है कि चलो अब तृणमूल कांग्रेस उसकी तरफ ज्यादा आकर्षित नहीं होगी और जनता दल (एकी) जैसी पार्टियां भी दूरी बनाएंगी। इस तरह उसे अपनी धर्मनिरपेक्षता दिखा कर जहां वाममोर्चा के हमले को कुंद करने में मदद मिलेगी वहीं यूपीए के भीतरी और बाहरी घटकों को बांधने में और सुविधा होगी। मोदी से अल्पसंख्यकों की नाराजगी का आलम तमाम राजनीतिक दल गुजरात की तारीफ करने के बाद दारुल उलूम देवबंद के कुलपति वस्तानवी के हश्र के तौर पर देख भी चुके हैं। लेकिन कांग्रेस यह भूल रही है कि मोदी हिंदुत्व ही नहीं उदारीकरण के भी आक्रामक पैरोकार हैं।
कांग्रेस अगर उदारीकरण पर धीमी चाल चलती है तो कॉरपोरेट लॉबी ही नहीं मध्यवर्ग का भी बाजारवादी हिस्सा उससे कटता है और अगर तेज चलती है तो सामान्य जनता के साथ तमाम राजनीतिक दल उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। इस बीच भ्रष्टाचार-विरोधी और लोकपाल-समर्थक आंदोलन खडेÞ हो जाते हैं या खडेÞ किए जाते हैं जो मोदी को आदर्श बताते हैं। भाजपा इन दोनों मौकों को लपकने के लिए तैयार बैठी है। लेकिन पार्टी का नेतृत्व हथिया लेने वाले मोदी यह भूल रहे हैं कि इस देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेतृत्व का विचित्र विभाजन रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की क्षेत्रीय जड़ें कमजोर भले हुई हों और वह समाप्त भी हो गया हो लेकिन किसी क्षेत्रीय नेता को अब तक राष्ट्रीय नेता बनते देखा नहीं गया। वह राष्ट्रीय दबाव भले बना ले जाता हो और हो सकता है कि देवगौड़ा की तरह कभी प्रधानमंत्री भी बन जाता हो लेकिन एक अखिल भारतीय प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
मोदी अगर राष्ट्रीय नेता बनने में सफल होते हैं तो भाजपा के भीतर ही नहीं, बाहर भी, राष्ट्रीय राजनीति में नए तरह का रूपांतरण होगा। मोदी का बहाना लेकर तमाम पिछडेÞ नेता कांग्रेस में अपनी अहमियत बढ़ाने का दबाव बनाएंगे। यानी अब हिंदू बनाम हिंदू यानी उदारता और कट्टरता की लड़ाई सवर्ण और अवर्ण के बीच नहीं, अवर्णों के बीच ही लड़ी जाएगी। सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता दोनों उनके हथियार हैं।
ऐसे में अपना महत्त्व खोती जा रही और भाजपा से काफी उम्मीद पाले रही सवर्ण राजनीति भी अण्णा हजारे और रामदेव के साथ मिल कर कुछ कर सकती है। मंडल आयोग की रपट लागू होने के बाद उसने उदारीकरण और मंदिर आंदोलन को अपना हथियार बनाया था। पर अब वे हथियार उसके हाथ से निकल चुके हैं। देखना है संघ परिवार उसे सत्ता में हिस्सेदारी देता है या प्रचारक बना कर छोड़ देता है। या कांग्रेस पार्टी उसके लिए कोई भूमिका तैयार करती है। क्योंकि वह हिंदुत्व के नए सवार की पालकी ढोने से हिचक रहा है और सवारी उसे मिलने से रही।
Monday, June 18, 2012
एक खुला पत्र - राष्ट्रपति चुनाव व पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम!
महोदय कलाम,
में इस पत्र के माध्यम से आपको संबोधित करना चाहूँगा! कृपया एक सैनिक, एक स्माजसेवी, एक देशभक्त क तरह चुनौती को साविकारिये, भारत माँ की सेवा कीजिए! यह वक़्त ओर यह अवसर किसी किसी विरले कर्मयोगी को ही मिलता है, जी हाँ, अब तक अधिकतर राष्ट्रपति किस्मत से ही बने है कर्म से नही!
आप पर हर भारतवासी को विश्वास है चाहे वो नेता हो या अभिनेता, सैनिक हो या अफ़सरशाह, नागरिक हो या विदेशी! आप किसी भी प्रचार माध्यम, चाहे वो बिका हो या निष्पक्ष आप हर POLL मे प्रथम पसंद है! हम जनता आपसे निवेदन करते है की आप हमारी आवाज़ सुनिए ना की हमारे चुने हुए पर अपने पार्टी प्रमुख के आगे छूके हुए मौकापरस्त मुठिभर लोगो की! देश को देखने दीजिए की देश की आवाज़ जो कैसे कुचलकर ये राजनैतिक प्रमुख कैसे अपनी रोटिया सेंक रहे हैं! आप ये राजनीति छोड़ दीजिए के अगर आप को 60% का आश्वासन मिलेगा तभी आप खड़े होंगे! कृपया आप राजनीति ना कीजिए, यह चुनाव महज एक चुनोती है आपके लिए ओर हमारे लिये! ना आप कभी हारेंगे ना हम!
ये हारजीत तो हमारी राज्नेतिक व्यवस्था की होनी है की - जीतेगा कौन - भ्रष्ट राजनेती या देशभक्त राजनेती?
में इस पत्र के माध्यम से आपको संबोधित करना चाहूँगा! कृपया एक सैनिक, एक स्माजसेवी, एक देशभक्त क तरह चुनौती को साविकारिये, भारत माँ की सेवा कीजिए! यह वक़्त ओर यह अवसर किसी किसी विरले कर्मयोगी को ही मिलता है, जी हाँ, अब तक अधिकतर राष्ट्रपति किस्मत से ही बने है कर्म से नही!
आप पर हर भारतवासी को विश्वास है चाहे वो नेता हो या अभिनेता, सैनिक हो या अफ़सरशाह, नागरिक हो या विदेशी! आप किसी भी प्रचार माध्यम, चाहे वो बिका हो या निष्पक्ष आप हर POLL मे प्रथम पसंद है! हम जनता आपसे निवेदन करते है की आप हमारी आवाज़ सुनिए ना की हमारे चुने हुए पर अपने पार्टी प्रमुख के आगे छूके हुए मौकापरस्त मुठिभर लोगो की! देश को देखने दीजिए की देश की आवाज़ जो कैसे कुचलकर ये राजनैतिक प्रमुख कैसे अपनी रोटिया सेंक रहे हैं! आप ये राजनीति छोड़ दीजिए के अगर आप को 60% का आश्वासन मिलेगा तभी आप खड़े होंगे! कृपया आप राजनीति ना कीजिए, यह चुनाव महज एक चुनोती है आपके लिए ओर हमारे लिये! ना आप कभी हारेंगे ना हम!
ये हारजीत तो हमारी राज्नेतिक व्यवस्था की होनी है की - जीतेगा कौन - भ्रष्ट राजनेती या देशभक्त राजनेती?
Friday, March 2, 2012
क्या बदला है - समय या हम?
जब एक इंसान मेहनत के बाद पसीने से भीगा हो, तो उसका स्वागत होना चाहिए ओर उसे पानी पूछा जाना चाहिए या उसे Deo OR perfume प्रयोग करने की सलाह! क्या पसीना अब मेहनत का प्रायावाची ना हो कर तिरस्कार हो गया है - ये बदलता समय हे या गिरती नेतीक्ता!
जब आपसे गाँधी जी का जन्म वर्ष पूछा जाए ओर आप seach box मे खोजकर उसका ज्वाब दे - ये बदलता समय हे या बदलती शिक्षा!
जब आपसे अपने संबंधी का दूरभाष संख्या पूछा जाए ओर आप अपने मोबाइल पर उसे खोजने लगे - ये बदलता समय हे या संबंधो की दूरियाँ!
जब आप कॉंक्रीट के शहरो मे किसी जानवर को आवारा घूमते पाएँ - क्या ये बदलता समय हे या हमारा जानवरो के प्रवास पर अतिक्रमण!
जब गोरे सूर्य स्नान अपने रंग को गहरा करने के लिए व काले fair & lovly गोरा करने के लिए प्रयोग करे - ये बदलता समय हे या अपनी अंदर की हीन भावना!
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