मित्रो दीवाली की शुभकामनाए! मेरी शुभकामनाए कुछ ज़्यादा लंबी है, अगर आपके पास समय हो तो पढे, अन्यथा शीर्षक से आप समझ गये होंगे! समझ नही आ रहा की कहाँ शुरूवात करूँ, बिना मिलावट की मीठायीयौ के दाम बहुत है, चॉक्लेट भेज कर मे इस पर्व की मर्यादा खंडित नही करना चाहाता, ये अमिताभ को ही मुबाराक हो, उन्होने इस दुश प्रचार के एवज मे ख़ासा मोटा भुगतान जो पाया है, बिस्कुतस ब्च्चो के लिए रहने देता हूँ, क्योंकि इस देश मे करोड़ो ब्च्चे भूख से मर रहे है, मे उनके दाम ओर नही बढ़ाना चाहता. मे चाह कर भी आपको सुखी जीवन का झूठा लारा देके अपने कर्तव्या का निर्वाह भी नही कर सकता, क्योंकि मे भी वोही जीवन भोग रहा हूँ! जिस देश मे भ्रष्टाचार खुद सरकार बन गया हो ओर उस देख के नागरिक मूक दर्शक, जिनमे सत्य का साथ ओर लड़ने की छमता मानो विलुप्त हो गयी हो वो सुखी जीवन केसे जी सकता है! कृप्या यह मत समझिएगा, की मॅ ना देने के बहाने बना रहा हूँ, में यकीनन सरकारी आकणै से ज़यादा कमा रहा हूँ! लेकिन पिछले कुछ सालो से घऱॉ की ब्याज दरों, किरायो, किरयना, सब्जी, टॅक्स व कई अन्य चीज़ो ने मेरी जेब खाली कर रखी है! अब किस गुदी के लाल मे दम है जो एकमुश्त पैसे देकर घर खरीद सके या पेट्रोल से चलने वाले वाहन रख सके! आप मेरे से असमह्त हो सकते है यदि आप भी मेरी तरह से सरकारी अनुमान से ५ गुणा ज़यादा कमाते तो है पर एक योग्य भ्रष्ट प्रोफेशनल भी है! मेरी सरकार ने मुझे ५ गुणा ज़यादा कमाने के बाद सिर्फ़ इस लायक छोड़ा है की मे आपको माटी के दिए या लक्ष्मी गणेश दे सकूँ! जो की उन कुम्हारो की दीवाली भी सज़ा देगा जिन्होने इस बदले समय के साथ अपने उत्पाद को मार्केट करना नही सीखा है! इस मार्केटिंग के युग मे हमारी हिंदुसतानि कंपनिया व सभ्यता खुद को कितना अहसाहाय महसूस कर रही है, कोको कोला, केड़बरी, एल जी, सॅमसंग, सोनी, पेप्सी व कई अन्य बहुराष्ट्रिया कंपनिया अरबो रुपये उडेल कर हमरा उल्लू बना रही है! फिर वही १४ ग्राम चिप्स १० रुपये मे, ठंडा पेय २५ रुपये मे, तेज़ाब व फीन्याल ७० रुपए मे ओर दुनिया भर मे नकारी गयी प्रोदोगिकि मन माने दामो मे! आप मुझे दकियानूस या पीड़ित या नेगेटिव सोच वाला मान सकते है! मेने ब्दलते समया के साथ अँग्रेज़ी बोलना व फेसबूक पर गपीयाना तो सिख लिया लेकिन अपने मूल्य नही ब्दल पाया. में प्रचार माध्यम के झान्सो मे नही उलझ पाया या फिर अपने होनहार क्रिकेटर्स की तरह पेसे कमाने के लालच मे त्योहार व देश की मर्यादा ताक पर रख कर पैसे कमाने नही सिख पाया! यकीन मानिए में ऐसा बिल्कुल नही था, जबतक में अपने माँ बाप के पैसै से दीवाली मनाता था, तब कभी भी मिठाई नकली होती है, या फिर पटाके पंहुच से बाहर है नही सुना था! पिताजी १२०० रुपये के वेतन मे हमारी पसंद की दीवाली मना पाते थे! बहुत सारे तोहफे आते थे ओर बहुत बाँटे जाते थे! अब मेरे पिताजी खुद कहते है बेटा जितना तुम कर पा रहे हो इतना भी बहुत है, इस वेल्न्टीन म्नाने वाले देश मे तुम्हारा दीवाली को जिंदा रखने का जो प्रयास है वो ही काफ़ी है! ऐसा नही है की सब कुछ बिगड़ा ही है, इंटरनेट ने हमारी कागज की बर्बादी कम कर के हमे जंगलो की कटाई से बचाया है, फेसबूक ने हमे ओर सामाजिक बनाया है (एक अहतियात, यहाँ भी कंपनिया इसे भुनाना चाहती है)! में आप सबको एक अपडॅट के माध्यम से संबोधित कर सकता हूँ! इसी सकरात्मक सोच के साथ में आपको शुभकामनाए देता हूँ व चाहता हू के हम मिल कर ऐसा प्रयास करे की में आपको अगले वर्ष खुशहाल जीवन की भी शुभकामनाए दे सकु!
by Nilanjan Sh on Monday, 24 October 2011 at 15:47
No comments:
Post a Comment