सिसकियाँ नही सुनती अब माँ यह रहन्नुमाह सरकार, अब तू ही मुझे बता क्यों नही अब मुझे दहाड़ना चाहिए!
तेरी कोख से जन्म पाकर तेरा ही दूध पीकर, माँ, अब तू ही मुझे बता क्यों नही तेरा आभार मानना चाहिए!
तेरे संस्कार, तेरी तहज़ीब, हर बार क्यों मुझे ही कायर कहलवाती है, हर बार कपूत, स्पूतौ की तहज़ीब पर ढहाका लगाये!
अब मत रोक, क्यों नही अब तू मुझे दिल खोल कर दहाड़ने देती माँ, क्यों ओर आख़िर कब तक अपने घावों को सहलाये!
मेरे अकेले का ये मर्म होता तो तेरी नसीहत समझ कर चुप रह लेता, ओर थोड़ा ओर सिस्क लेता, तुझसे ना यह प्रश्न करता!
यही सोच कर अब तक चुप रहा तो पता चला माँ, ये मेरा मर्म है यही सोचकर हर जऱाँ ओर शक्स यहाँ पर है सिसकता!
सिसकियाँ नही सुनती अब माँ यह रहन्नुमाह सरकार, अब तू ही मुझे बता क्यों नही अब मुझे दहाड़ना चाहिए!
माँ क्या अब पांडवो पर कौरव भारी पड़नगे, श्री कृशण को भी भ्रष्टाचार के आरोप सहने होंगे! क्या अब भी सभासद चुप रहँगे!
ध्रत्राष्ट्र पगड़ी पहन कर माँ का वस्त्र हर्न होने देगा, ऑर द्रोपदि इस एहसास से गर्वित होगी की मै नही, अब तेरी माँ की बारी है!
में तो पीतामाह नही, किसी वचन से बँधा नही, में कोई सभासद भी नही, किसी लालच से ग्रस्त नही, फिर में कयूं सिसकाता रहूं!
अहंकारी अहंकार भरे अपनी ताक़त का मुझे धत्ता बताए, में कायर कहलाउं बिना कोई वार किए, ये अपमान का घूँट भी में ही पियूं!
सिसकियाँ नही सुनती अब माँ यह रहन्नुमाह सरकार, अब तू ही मुझे बता क्यों नही अब मुझे दहाड़ना चाहिए!
तेरी कोख से जन्म पाकर तेरा ही दूध पीकर, माँ, अब तू ही मुझे बता क्यों नही तेरा आभार मानना चाहिए!
तेरी कोख से जन्म पाकर तेरा ही दूध पीकर, माँ, अब तू ही मुझे बता क्यों नही तेरा आभार मानना चाहिए!
तेरे संस्कार, तेरी तहज़ीब, हर बार क्यों मुझे ही कायर कहलवाती है, हर बार कपूत, स्पूतौ की तहज़ीब पर ढहाका लगाये!
अब मत रोक, क्यों नही अब तू मुझे दिल खोल कर दहाड़ने देती माँ, क्यों ओर आख़िर कब तक अपने घावों को सहलाये!
मेरे अकेले का ये मर्म होता तो तेरी नसीहत समझ कर चुप रह लेता, ओर थोड़ा ओर सिस्क लेता, तुझसे ना यह प्रश्न करता!
यही सोच कर अब तक चुप रहा तो पता चला माँ, ये मेरा मर्म है यही सोचकर हर जऱाँ ओर शक्स यहाँ पर है सिसकता!
सिसकियाँ नही सुनती अब माँ यह रहन्नुमाह सरकार, अब तू ही मुझे बता क्यों नही अब मुझे दहाड़ना चाहिए!
माँ क्या अब पांडवो पर कौरव भारी पड़नगे, श्री कृशण को भी भ्रष्टाचार के आरोप सहने होंगे! क्या अब भी सभासद चुप रहँगे!
ध्रत्राष्ट्र पगड़ी पहन कर माँ का वस्त्र हर्न होने देगा, ऑर द्रोपदि इस एहसास से गर्वित होगी की मै नही, अब तेरी माँ की बारी है!
में तो पीतामाह नही, किसी वचन से बँधा नही, में कोई सभासद भी नही, किसी लालच से ग्रस्त नही, फिर में कयूं सिसकाता रहूं!
अहंकारी अहंकार भरे अपनी ताक़त का मुझे धत्ता बताए, में कायर कहलाउं बिना कोई वार किए, ये अपमान का घूँट भी में ही पियूं!
सिसकियाँ नही सुनती अब माँ यह रहन्नुमाह सरकार, अब तू ही मुझे बता क्यों नही अब मुझे दहाड़ना चाहिए!
तेरी कोख से जन्म पाकर तेरा ही दूध पीकर, माँ, अब तू ही मुझे बता क्यों नही तेरा आभार मानना चाहिए!
by Nilanjan Sh
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